मेरी वो बस्ती

 

हरे भरे पेड़ों के झुरमुट में

आखरोट का वो पेड़

उस पेड़ पे नन्ही गुड़ियों का झूला

किलकारियों की गूंज में बसी हुई थी बस्ती

 

हरे भरे पेड़ों के झुरमुट में

आखरोट का वो पेड़

उस पेड़ पे नहीं कोई झूला

बन्दूकों की गूंज से सहमी हुई है बस्ती

 

- अंश


ऐसा बहुत कम होता है जब किसी के दिल से निकली हुई चार पंक्तियां दूर-दूर तक बसे हुए लोगों के दिल में उतर जायें । अंश की ये छोटी सी कविता कुछ ऐसा ही दर्द पैदा करती हैं । सैकड़ों चित्र, हज़ारों पुस्तकें और लाखों खबरें भी आतंकवाद के मानव जीवन पर प्रभाव का ऐसा वर्णन नहीं कर सकती जो काश्मीर में पली अंश ने इन पंक्तियों मे लिख दिया है । 

मूल रूप रोमन लिपि में यहां है ।

 Free Web Hosting